‘भीकू भैय्या का धनिया’

ऐसे तो जयपुर में बहुत सारे फेरीवाले घूमते हैं लेकिन हमारे घर के बहार से जाते थे भीकू भैय्या| भीकू भैय्या की एक पिसाई की दूकान थी जिसमे वो इमरती और जलेबी के लिए दाल पीस कर देते थे और उस ही दाल के बड़े भी बनाते थे, बस उस ही बड़े और कांजी की फेरी लगाते थे हमारे भीकू भैय्या| कांजी बड़ा जयपुर में बहुत खाया जाता है; पेट भरने जैसा नहीं होता लेकिन अच्छा होता है– दो तीन बड़े और दूना भर के खट्टा चटपटा पानी| कांजी तो सब ही बड़े वाले बनाते थे लेकिन भीकू भैय्या की अलग होती थी– एक धनिये वाली दूसरी इमली वाली;धनिये वाली में धनिये के कच्चे बीज भी डालते थे और इमली वाले में गुड़| स्पेशलिटी थी ये हमारे भीकू भैय्या की सो वो आवाज़ भी ऐसे ही लगाते थे– ‘भीकू की इमली’ ‘भीकू का धनिया’!!
हमारे घर में ऐसे तो कोई कांजी बड़े का शौक़ीन नहीं था लेकिन हमायी अम्मा (दादी) को बहुत पसंद था सो भीकू भैय्या को सख्त हिदायत थी की मोहल्ले भर में गला फाड़ कर चिल्लाने से पहले एक दूना भर के दादी को पहुंचा दे, और भीकू भैय्या काम के बड़े पक्के रहे हमेशा| होता यूँ था कि रोज़ तो मैं स्कूल में रहती थी लेकिन रविवार को सुबह 7 बजे उठ कर अम्मा के पास चली जाती और भीकू भैय्या को बड़ी बड़ी आँखों से मुँह टेढ़ा कर के देखती रहती फिर वो मुझे एक दूना भर के धनिया पानी और बड़ा दे देते थे, इमली पानी नहीं देते थे कभी, उसमें मिर्च होती थी|

 

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भीकू भैय्या का धनिया पानी

 

 

एक दिन मैं ज़िद पे अड़ गयी और अम्मा को रुआंसी हो कर बोली ” अम्मा देखो ई हमको इमली वाला नाही दे रहे ”
फिर अम्मा बिगड़ते हुए बोली “क्यों रे भीकू हमार बचवा को तू इमली के वास्ते तरसा रहा?”
” अरे ना ना अम्मा तरसे तुम्हाये दुसमन हमको तो बड़ी मालकिन बोले रही कि गुड्डन बिटिया का गला फूल जाता इमली से, सो ना दिए ”
” अरे दो घूँट से कोनो गला न फूले दे दे थोड़ा सा बालक ने ”
बस फिर क्या था हर रविवार को गला गाल तक फूल जाता था और आवाज़ हो जाती थी मेंढक जैसी लेकिन फिर से पानी तो हम इमली वाला ही लेते थे पर जाने क्यों हर बार भीकू भैय्या हमको पहले धनिये का पानी ही देते थे पर नींबू धनिये का पानी कहाँ अच्छा लगता है इमली वाले के आगे? तो मैं दूना ले का बरामदे में जाती और एक खाली गमले में धनिये वाला पूरा पानी दाल देती और बड़ा गप्प कर जाती फिर बारी आती इमली वाले पानी की; अम्मा जब तक अपने पोपले मुँह से एक बड़ा चुभलाती तब तक मैं दो गटक जाती थी| ऐसा हमेशा चलता रहा धनिये का पानी गमले में और इमली का पानी दूने में| ये गमला भी अपनी तोंद में बहुत चीज़े लिए बैठा रहता था बापूजी इसमें पीक थूंक जाते थे, बड़े भैया अपना शाम का दूध गमले को चढ़ा देते थे और चुनिया (हमारी चचेरी बहन) अपने टेस्ट पेपर फाड़ के गमले में दाल देती थी और फिर बची मैं तो मैं उसमें धनिया का पानी डाल देती थी| गमले ने भी कभी शिकायत नहीं की और ये सब चलता रहा…
फिर एक दिन भीकू भैय्या ने आना बंद कर दिया किसी ने बताया कि दरभंगा में उनके लड़के की पी डब्लू डी में नौकरी लग गयी है, पूरा परिवार उधर ही चला गया…
कुछ आठ दस साल हो गए इस बात को भी;हम मोहल्ले से कॉलोनी में आ गए बापूजी ने पान खाना बंद कर दिया है; बड़े भैया अब कर्णाटक में हैं; चुनिया का ब्याह हो गया और अम्मा अब ऊंचा सुनने लगी हैं|
अब “भीकू का धनिया – भीकू की इमली” नहीं सुनाई देता लेकिन वो गमला अब भी भीकू का धनिया उगाता है| इतने साल उसने भीकू भैय्या का धनिया पानी जो पीया है… आज भी बारिश के बाद इस गमले में भीकू भैय्या का धनिया बड़े शान से लहलहाता है… कहीं आपको भीकू भैय्या मिल जाएँ तो उनको ज़रूर बताना की उनका धनिया आज भी जयपुर में ही है…!

 

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भीकू भैय्या का धनिया